आशियाँ रेगिस्तान का…


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नन्हे पौधे को प्यार मिला बहोत उसकी बाहर मैं,

पूरे आँगन मैं त्रुन मैं वोह अकेला,

नन्ही सी जान बढ़ी प्यार की मिठास मैं,

हर मौसम मैं ख़ुशी मैं अलबेला…

मौसम बदले दिन बदले, खुशियाँ बहोत देखि,

फिर एक दिन, दिल झूम जाये जैसे, ऐसी बरखा आई

न जाने क्या ख़ास था उस पानी मैं,

हरियाली मैं प्यार कर बैठा उस जल से!

बरखा के पानी को अपना मानकर काटे उसने कई अरसे,

मन मैं उसके फूल खिले जब हु पानी बरसे.

आशियाँ बनाया उसने अपने जीवन का,

ज़िन्दगी एक नयी ताल पे गुनगुनाने लगा वोह भोला!

फिर इक दिन रुतु बदली इस तरह, की झट से जलने लगा मन

न जाने किस समय था, दूर लगा अपनापन.

निश्छल समझा मौसम हा पतझड़ का,

मगर गिरते हुए पन्नो की को और ही थी दिशा.

फिर न आई कभी बरखा उस आँगन मैं,

सूखी डाले राह  देखती रही क्षितिज मैं!

जब लगा की कोई रुख बदल रही है हवा,

वो न थी वर्षा, बस थी मृगतृषा…

उस मृगजल को ताके और चाहे फिर अपने प्यार को पान,

मगर देखना हर हरियाली मैं दिखेगी एक सूखा बेचारा…

तमन्ना जरूर है उसके प्रीत की लौटने की

पर दिखती सिर्फ उसे है सेहरा रेत की!

आशियाँ टूटा, जैसे कांच का हो तिनका बिखरा

टूटी जीने की चाह, मगर मौत भी निकली बेवफा…

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